कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)

कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)

पिय-प्यारी निज केलि मैं, तन मन मिलि अभिराम ।
अंग-अंग सोभा सरस, कुंज-महल निज धाम ॥

- श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)

प्रिया-प्रियतम अपनी अंतरंग केलि में, तन और मन से एक होकर अत्यंत मनोहर लग रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग की शोभा परम मधुर है, और कुंज-महल ही उनकी केलि का निज धाम है।