रस मत्त बिहारिनि प्यारी है।
नेंक लखें बस भये लाडिले, अद्भुत रूप उज्यारी है ॥ [1]
उमग्यौ रंग सरोवर हिय में, मृदु मुसकनि कछु न्यारी है ।
श्रीहरिदासी के हित विहरत, जीवनि प्रान हमारी है ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (69)
श्री कुंजबिहारिन (श्री राधा) प्यारी प्रेमोन्माद में उन्मत्त रहती हैं। उनका रूप अद्भुत उज्ज्वलता से युक्त है; केवल थोड़ी सी दृष्टि से निहारने मात्र से ही श्री कृष्ण उनके अधीन हो जाते हैं। [1]
उनकी मृदुल मुस्कान में ऐसा जादू है कि हृदय में प्रेम-रस का सरोवर उमड़ पड़ता है। हमारे जीवन की प्राणधन श्यामा प्यारी अपनी निज सखियों, अर्थात् ललिता हरिदासी जी, को सुख प्रदान करने के लिए ही नित्य विहार करती हैं। [2]
नेंक लखें बस भये लाडिले, अद्भुत रूप उज्यारी है ॥ [1]
उमग्यौ रंग सरोवर हिय में, मृदु मुसकनि कछु न्यारी है ।
श्रीहरिदासी के हित विहरत, जीवनि प्रान हमारी है ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (69)
श्री कुंजबिहारिन (श्री राधा) प्यारी प्रेमोन्माद में उन्मत्त रहती हैं। उनका रूप अद्भुत उज्ज्वलता से युक्त है; केवल थोड़ी सी दृष्टि से निहारने मात्र से ही श्री कृष्ण उनके अधीन हो जाते हैं। [1]
उनकी मृदुल मुस्कान में ऐसा जादू है कि हृदय में प्रेम-रस का सरोवर उमड़ पड़ता है। हमारे जीवन की प्राणधन श्यामा प्यारी अपनी निज सखियों, अर्थात् ललिता हरिदासी जी, को सुख प्रदान करने के लिए ही नित्य विहार करती हैं। [2]

