अंवर कंवर जौ जुरै, रुखौउ उत्तम भोग।
वृन्दावन परि रहौ, दुख सुख कुछ संजोग ॥
- श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (19)
चाहे पहनने को वस्त्र और ओढ़ने को कंबल, और खाने को उत्तम अथवा रूखा भोग मिले या न मिले, तथा सुख-दुःख जैसे भी संयोग हों, कैसी भी परिस्थिति हो, वृन्दावन में सदा पड़े रहना ही जीवन की सर्वोच्च सार्थकता है।
वृन्दावन परि रहौ, दुख सुख कुछ संजोग ॥
- श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (19)
चाहे पहनने को वस्त्र और ओढ़ने को कंबल, और खाने को उत्तम अथवा रूखा भोग मिले या न मिले, तथा सुख-दुःख जैसे भी संयोग हों, कैसी भी परिस्थिति हो, वृन्दावन में सदा पड़े रहना ही जीवन की सर्वोच्च सार्थकता है।

