(छप्पय)
धर्म अर्थ फल काम मोक्ष सब दूर विराजैं ।
कहा तिन की बतरान वृथा कीजै बिन काजैं ॥ [1]
हरि की भक्ति अनन्य महा पदवी कहि गाई ।
सिर माथे पै रहौ कहौं पै निज मन भाई॥ [2]
अद्भुत नवल किशोरी मणि वसत कुंज वृन्दाविपिन ।
रुचत न मेरौ मन कहूँ जासु रसामृतदास्य बिन॥ [3]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (77)
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने की भी तनिक अभिलाषा नहीं है। [1]
श्रीहरि की वह एकान्त भक्ति-योग की पदवी भी यथास्थान प्रतिष्ठित रहे—हम उसे प्रणाम अवश्य करते हैं, किन्तु उससे भी हमें क्या प्रयोजन? जिसके हृदय को जो भाए, वह उसी का गुणगान करे। [2]
हमारे चित्त को तो केवल श्रीवृन्दावन-सीमा में विराजमान उस घनीभूत आश्चर्यमयी किशोरी-मणि श्रीराधा की दासता-रूप रसामृत के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं प्रतीत होता। [3]
धर्म अर्थ फल काम मोक्ष सब दूर विराजैं ।
कहा तिन की बतरान वृथा कीजै बिन काजैं ॥ [1]
हरि की भक्ति अनन्य महा पदवी कहि गाई ।
सिर माथे पै रहौ कहौं पै निज मन भाई॥ [2]
अद्भुत नवल किशोरी मणि वसत कुंज वृन्दाविपिन ।
रुचत न मेरौ मन कहूँ जासु रसामृतदास्य बिन॥ [3]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (77)
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने की भी तनिक अभिलाषा नहीं है। [1]
श्रीहरि की वह एकान्त भक्ति-योग की पदवी भी यथास्थान प्रतिष्ठित रहे—हम उसे प्रणाम अवश्य करते हैं, किन्तु उससे भी हमें क्या प्रयोजन? जिसके हृदय को जो भाए, वह उसी का गुणगान करे। [2]
हमारे चित्त को तो केवल श्रीवृन्दावन-सीमा में विराजमान उस घनीभूत आश्चर्यमयी किशोरी-मणि श्रीराधा की दासता-रूप रसामृत के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं प्रतीत होता। [3]

