मुख सो भाषे अनन्यता, तन में राखे टोंठि ।
ठाकुर के आगे धरे, उजवना की औंठि ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (30)
लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।
ठाकुर के आगे धरे, उजवना की औंठि ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (30)
लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।

