स्वारथमूल असुद्ध त्यों, सुद्ध स्वभावऽनुकूल ।
नारदादि प्रस्तार करि, कियौ जाहि को तूल॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (41)
जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहा जाता है और जो निष्काम अथवा सहज भाव से केवल प्रियतम के सुख के लिए किया जाता है, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है। नारद आदि महर्षियों ने इन दोनों प्रकार के प्रेम का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
नारदादि प्रस्तार करि, कियौ जाहि को तूल॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (41)
जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहा जाता है और जो निष्काम अथवा सहज भाव से केवल प्रियतम के सुख के लिए किया जाता है, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है। नारद आदि महर्षियों ने इन दोनों प्रकार के प्रेम का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।

