(राग रामकली)
धाइके जाइ जी जमुना-तीरे।
ताकी महिमा अब कहाँ लौं बरनिये, जाइ परसत अति प्रेम नीरे॥ [1]
निसिदिन केलि करत मनमोहन, पिया लै जु भक्त की संग भीरे।
“छीत स्वामी” गिरिधरन श्रीविठ्ठल, इनि-बिनु नेकु न धरत धीरे॥ [2]
- श्री छीत स्वामी, श्री छीत स्वामी जी की वाणी (164)
दौड़कर यमुना के तट पर चलो। उसकी महिमा कहाँ तक वर्णित की जा सकती है? यमुना जी के नीर का स्पर्श करते ही हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है। [1]
मनमोहन श्रीकृष्ण दिन-रात वहाँ अपनी प्रिया श्री राधा के संग मधुर केली-क्रीड़ा करते हैं और भक्तों को परम रस प्रदान करते हैं। ‘छीत स्वामी’ कहते हैं— गिरिधर लाल तथा उनके भक्तजन यमुना-किनारे की इन लीलाओं के बिना एक क्षण भी चैन नहीं लेते। [2]
धाइके जाइ जी जमुना-तीरे।
ताकी महिमा अब कहाँ लौं बरनिये, जाइ परसत अति प्रेम नीरे॥ [1]
निसिदिन केलि करत मनमोहन, पिया लै जु भक्त की संग भीरे।
“छीत स्वामी” गिरिधरन श्रीविठ्ठल, इनि-बिनु नेकु न धरत धीरे॥ [2]
- श्री छीत स्वामी, श्री छीत स्वामी जी की वाणी (164)
दौड़कर यमुना के तट पर चलो। उसकी महिमा कहाँ तक वर्णित की जा सकती है? यमुना जी के नीर का स्पर्श करते ही हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है। [1]
मनमोहन श्रीकृष्ण दिन-रात वहाँ अपनी प्रिया श्री राधा के संग मधुर केली-क्रीड़ा करते हैं और भक्तों को परम रस प्रदान करते हैं। ‘छीत स्वामी’ कहते हैं— गिरिधर लाल तथा उनके भक्तजन यमुना-किनारे की इन लीलाओं के बिना एक क्षण भी चैन नहीं लेते। [2]

