चल न सकै निज ठौर तैं जे तन द्रुम अभिराम- श्री रसनिधि

चल न सकै निज ठौर तैं जे तन द्रुम अभिराम- श्री रसनिधि

चल न सकै निज ठौर तैं, जे तन द्रुम अभिराम ।
तहाँ आइ रस वरसिवौ, लाजिम तुहि घनस्याम ॥

- श्री रसनिधि

हे मेघ! जैसे अचल वृक्ष स्वयं चलकर जल ग्रहण नहीं कर सकते, वैसे ही तुम्हारा धर्म है उन तक वर्षा पहुँचाना। उसी प्रकार जब जीव संसार की निरंतर दौड़ से थककर रुक जाए और पूर्ण आत्मसमर्पण कर दे, तब घनश्याम प्रभु स्वयं उसके समीप आकर उसकी रक्षा करते हैं तथा उस पर अपने दिव्य रस की वर्षा करते हैं।