नव कुंज-सदन मैं आज रँगीली होरी।
इत स्यामा, उत स्याम मनोहर, खेलत उमँग न थोरी॥ [1]
छल-बल घात लगावत मोहन, अंग बचावत गोरी।
सावधान दोउ सुघर मनोहर, अपनी-अपनी ओरी॥ [2]
कोक-कला कल-केलि परस्पर, जोबन जोर किसोरी।
चतुर खिलार लाड़िली लालन, तुम जिन जानौ भोरी॥ [3]
हाहा करौ, परौ पायन अब, ना चलिहैं बरजोरी।
भगवत रसिक उदार स्वामिनी, दैहैं सर्बसु छोरी॥ [4]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.2)
नव-निकुंज-महल में आज रंगों से सराबोर होली की अद्भुत छटा छाई हुई है। एक ओर श्रीकिशोरीजी हैं और दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर दृढ़ता से उपस्थित हैं। दोनों अनन्त उमंगों और हर्षोल्लास के साथ परस्पर होली-लीला में उन्मत्त हैं। [1]
छबीले श्यामसुन्दर बार-बार छल और बल से किशोरीजी पर रंग डालने का प्रयत्न कर रहे हैं, परन्तु किशोरीजी हर बार कुशलता से अपने अंगों को बचा लेती हैं। ये सुभग, मनोहर प्रिया और लाल — दोनों ही अपने-अपने पक्ष में अत्यन्त निपुण और सजग हैं। कोई भी एक-दूसरे पर अपना रंग नहीं चढ़ा पा रहा है। [2]
तभी एक सखी मुस्कराकर प्रियतम से कहती है — “हे लालजी! हमारी लाड़लीजी को भोली समझने की भूल मत करो। यौवन के सहज वेग से प्रेरित इन मनोहर प्रेम-केलियों में ये अत्यन्त निपुण हैं। इस प्रकार ये कभी तुम्हारे वश में आने वाली नहीं। तुमने बहुत बरजोरी कर ली, कपट-चाल भी चली; किन्तु फिर भी किशोरीजी एक बार भी तुम्हारे दाँव में नहीं आईं।” [3]
तुम्हारी बरजोरी यहाँ बिलकुल नहीं चलेगी। वही उपाय अपनाओ, जो सदा से करते आए हो — हमारी प्यारी से विनती करो, इनके चरणों में पड़ो । स्वामिनीजी अत्यन्त उदार हैं; ऐसा करते ही वे अपना सर्वस्व तुम्हें सहज भाव से अर्पित सौंप देंगी। [4]
इत स्यामा, उत स्याम मनोहर, खेलत उमँग न थोरी॥ [1]
छल-बल घात लगावत मोहन, अंग बचावत गोरी।
सावधान दोउ सुघर मनोहर, अपनी-अपनी ओरी॥ [2]
कोक-कला कल-केलि परस्पर, जोबन जोर किसोरी।
चतुर खिलार लाड़िली लालन, तुम जिन जानौ भोरी॥ [3]
हाहा करौ, परौ पायन अब, ना चलिहैं बरजोरी।
भगवत रसिक उदार स्वामिनी, दैहैं सर्बसु छोरी॥ [4]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.2)
नव-निकुंज-महल में आज रंगों से सराबोर होली की अद्भुत छटा छाई हुई है। एक ओर श्रीकिशोरीजी हैं और दूसरी ओर श्रीश्यामसुन्दर दृढ़ता से उपस्थित हैं। दोनों अनन्त उमंगों और हर्षोल्लास के साथ परस्पर होली-लीला में उन्मत्त हैं। [1]
छबीले श्यामसुन्दर बार-बार छल और बल से किशोरीजी पर रंग डालने का प्रयत्न कर रहे हैं, परन्तु किशोरीजी हर बार कुशलता से अपने अंगों को बचा लेती हैं। ये सुभग, मनोहर प्रिया और लाल — दोनों ही अपने-अपने पक्ष में अत्यन्त निपुण और सजग हैं। कोई भी एक-दूसरे पर अपना रंग नहीं चढ़ा पा रहा है। [2]
तभी एक सखी मुस्कराकर प्रियतम से कहती है — “हे लालजी! हमारी लाड़लीजी को भोली समझने की भूल मत करो। यौवन के सहज वेग से प्रेरित इन मनोहर प्रेम-केलियों में ये अत्यन्त निपुण हैं। इस प्रकार ये कभी तुम्हारे वश में आने वाली नहीं। तुमने बहुत बरजोरी कर ली, कपट-चाल भी चली; किन्तु फिर भी किशोरीजी एक बार भी तुम्हारे दाँव में नहीं आईं।” [3]
तुम्हारी बरजोरी यहाँ बिलकुल नहीं चलेगी। वही उपाय अपनाओ, जो सदा से करते आए हो — हमारी प्यारी से विनती करो, इनके चरणों में पड़ो । स्वामिनीजी अत्यन्त उदार हैं; ऐसा करते ही वे अपना सर्वस्व तुम्हें सहज भाव से अर्पित सौंप देंगी। [4]

