गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु -  श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)

गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)

(राग सारंग)
गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु ।
तेरौई नाम जपत और बिलपतु है, कामकौ स्यामहिं संक सु॥ [1]
कह्यौ न परै दारुन दुख प्यारी, तेरे विरह मोहन के कंठ रह्यौ असु।
व्यासस्वामिनी करुनाकरि राख्यौ, हरि चाख्यौ अधर-सुधारसु॥ [2]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (170)

इस पद में श्रीकृष्ण की विरह-अवस्था का वर्णन है। सखी-भावापन्न हरिराम व्यास श्रीराधा से प्रार्थना कर रहे हैं—
हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण निरंतर तुम्हारा ही यश गा रहे हैं। वे केवल तुम्हारे ही नाम का जाप कर रहे हैं और विरह में बिलख (रो) रहे हैं। काम ने श्याम को इतना व्यथित कर दिया है कि वे तुम्हारे प्रेम में पूरी तरह व्याकुल हो उठे हैं। [1]

हे प्यारीजू ! तुम्हारे विरह में श्री मोहन को जो दारुण (अत्यंत) दुःख हो रहा है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि उनके प्राण उनके कंठ तक आ गए हैं (अर्थात् वे विरह में मृत्युतुल्य कष्ट सह रहे हैं)। व्यास जी कहते हैं कि हे मेरी स्वामिनी श्रीराधे! अब कृपा करके उन्हें दर्शन दीजिए और उनके प्राण बचा लीजिए, जिससे श्री हरि पुनः आपके अधरों के अमृत-रस का पान कर सकें । [2]