यत्पादाम्बुरुहेक रेणु-कणिकां मूध्र्ना निधातुं न हि प्रापुर्ब्रह्म शिवादयोप्यधिकृतिं गोप्यैक भावाश्रयाः ।
सापि प्रेमसुधा रसाम्बुधिनिधी राधापि साधारणीभूता कालगतिक्रमेण बलिना हे दैव तुभ्यं नमः ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (72)
जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय की प्रबल गति से साधारण गोपी सी प्रतीत हो गई हैं — हे दैव (काल)! तुम्हें नमस्कार है।
सापि प्रेमसुधा रसाम्बुधिनिधी राधापि साधारणीभूता कालगतिक्रमेण बलिना हे दैव तुभ्यं नमः ॥
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (72)
जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय की प्रबल गति से साधारण गोपी सी प्रतीत हो गई हैं — हे दैव (काल)! तुम्हें नमस्कार है।

