रंगीली गलिन बिच हो हो होरी ।
इत नंदनन्दन रसिक लाड़िलो, उत वृषभान किसोरी ॥ [1]
उड़त गुलाल कछु नहीं सूझत, झकझोरा झकझोरी ।
नागरीदास परसपर ढारत, भर भर कनक कमोरी ॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143)
बरसाना की रंगी गली में अपार उमंग के साथ होली खेली जा रही है। एक ओर नन्दनन्दन रसिक श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर वृषभानुनंदिनी श्रीराधा अपनी सखियों सहित विराजमान हैं। [1]
चारों दिशाओं में उड़ते हुए गुलाल की ऐसी लालिमा छा गई है कि कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता। हँसी-ठिठोली, चंचल चेष्टाओं और प्रेममयी छीना-झपटी से सारा वातावरण मधुर हो उठा है। नागरीदास जी वर्णन करते हैं कि राधा-कृष्ण युगल सोने के कलशों में रंग भर-भरकर परस्पर एक-दूसरे पर उँडेल रहे हैं, और उस अलौकिक होली की छटा निराली ही प्रतीत होती है। [2]
इत नंदनन्दन रसिक लाड़िलो, उत वृषभान किसोरी ॥ [1]
उड़त गुलाल कछु नहीं सूझत, झकझोरा झकझोरी ।
नागरीदास परसपर ढारत, भर भर कनक कमोरी ॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143)
बरसाना की रंगी गली में अपार उमंग के साथ होली खेली जा रही है। एक ओर नन्दनन्दन रसिक श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर वृषभानुनंदिनी श्रीराधा अपनी सखियों सहित विराजमान हैं। [1]
चारों दिशाओं में उड़ते हुए गुलाल की ऐसी लालिमा छा गई है कि कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता। हँसी-ठिठोली, चंचल चेष्टाओं और प्रेममयी छीना-झपटी से सारा वातावरण मधुर हो उठा है। नागरीदास जी वर्णन करते हैं कि राधा-कृष्ण युगल सोने के कलशों में रंग भर-भरकर परस्पर एक-दूसरे पर उँडेल रहे हैं, और उस अलौकिक होली की छटा निराली ही प्रतीत होती है। [2]

