प्रिया बदन सुखमा सदन, रह्यो प्रेम परिपूरि।
जा मधि प्रीतम प्राण की, सरबस जीवनि मूरि ॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (05)
श्री प्रिया जू का मुख कमल सुख का वह सदन है जो प्रेम से परिपूर्ण है, जिसमें प्रियतम के प्राण बसे हुए हैं। वही उनके प्राणों का आधार है।
जा मधि प्रीतम प्राण की, सरबस जीवनि मूरि ॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (05)
श्री प्रिया जू का मुख कमल सुख का वह सदन है जो प्रेम से परिपूर्ण है, जिसमें प्रियतम के प्राण बसे हुए हैं। वही उनके प्राणों का आधार है।

