वामुख की आशा लगी, तजी आस सब जोग ।
अब स्वासा हू तजेगी, जो न बने संजोग ॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (28)
अब मुझे केवल उन (प्रिया-प्रियतम) के मुख-दर्शन की ही उत्कंठा लगी है। योग, साधना और अन्य सभी उपायों की आशा मैंने पूर्णतः त्याग दी है। अब यदि शीघ्र ही उनके साथ मेरा मिलन (संजोग) नहीं हुआ, तो ये प्राण भी छूट जाएँगे।
अब स्वासा हू तजेगी, जो न बने संजोग ॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (28)
अब मुझे केवल उन (प्रिया-प्रियतम) के मुख-दर्शन की ही उत्कंठा लगी है। योग, साधना और अन्य सभी उपायों की आशा मैंने पूर्णतः त्याग दी है। अब यदि शीघ्र ही उनके साथ मेरा मिलन (संजोग) नहीं हुआ, तो ये प्राण भी छूट जाएँगे।

