सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)

सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)

सखी! सब, ह्वै गये लालहिं लाल।
ऐसो रंग चल्यो पिचकारिन, ऐसो उड़यो गुलाल ॥ [1]
लाली लाल, लाल भये लालहुँ, लाल भईं ब्रजबाल ।
तरुवर लाल, लाल भये सरवर, शुक, पिक लाल मराल॥ [2]
धेनु लाल ब्रजरेनु लाल भइ, लाल भये सब ग्वाल।
बाहर लाल 'कृपालु' फाग को, भीतर लाल गुपाल॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, होरी माधुरी (24)

एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी ! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गुलाल उड़ा कि जड़-चेतन सब लाल हो गये। [1] 

श्यामसुन्दर लाल हो गये, किशोरी जी भी लाल हो गयीं और ब्रजबालाएँ भी लाल हो गयीं तथा समस्त वृक्ष और सरोवर भी लाल हो गये। तोते, कोयल एवं हंस आदि भी लाल हो गए। [2]

समस्त गायें एवं ब्रज की रज भी लाल हो गयीं एवं समस्त ग्वाल बाल भी लाल हो गये। जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज कहते हैं कि बाहर तो फाग सम्बन्धी गुलाल आदि के रंग से लाल हो उठे हैं एवं आंतरिक रूप से सब लोग लाड़ली-लाल के अनुराग में रंजित हैं। [3]