खंजन मृग सरमाय के, विपिन बसै दिन रैन ।
सफरी सरसिज जल छिपे, देखि श्याम के नैन॥
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (01)
श्री श्यामसुन्दर के चंचल नेत्रों की अनुपम शोभा को देखकर खंजन पक्षी और हिरण लज्जित होकर दिन-रात जंगल में रहने लगे । इसी प्रकार, मछली और कमल भी उनके नयनों की तुलना में स्वयं को तुच्छ पाकर जल के भीतर छिप गए। भाव यह है कि श्री कृष्ण के नेत्रों की सुंदरता के समक्ष संसार की समस्त सुंदर उपमाएँ फीकी पड़ गई हैं।
सफरी सरसिज जल छिपे, देखि श्याम के नैन॥
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (01)
श्री श्यामसुन्दर के चंचल नेत्रों की अनुपम शोभा को देखकर खंजन पक्षी और हिरण लज्जित होकर दिन-रात जंगल में रहने लगे । इसी प्रकार, मछली और कमल भी उनके नयनों की तुलना में स्वयं को तुच्छ पाकर जल के भीतर छिप गए। भाव यह है कि श्री कृष्ण के नेत्रों की सुंदरता के समक्ष संसार की समस्त सुंदर उपमाएँ फीकी पड़ गई हैं।

