आये फाग खेलन गोपाल बरसाने में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक

आये फाग खेलन गोपाल बरसाने में - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक

(कवित्त)
आये फाग खेलन गोपाल बरसाने में,
गावें ख्याल दे दे ताल, उर हरषत हैं। [1]
इततें किशोरी गोरी सखिन के यूथ महँ,
लेकर अबीर पै कपोल परसत हैं ॥ [2]
कंचन पिचकारी तकी मारत बिहारी नीर,
‘लाल बलबीर’ अंग प्रीत दरसत हैं। [3]
छतन तें छज्जन तें झरोखन तें मोखन तें,
आज नन्दलाल पै गुलाल बरसत हैं ॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, षड्ऋतु शतक

श्री गोपाल बरसाने में फाग (होली) खेलने के लिए पधारे हैं। चारों ओर लोग फागुन के गीत गा रहे हैं, हाथ से ताल दे रहे हैं, और सबका हृदय आनंद से झूम रहा है। [1]

इधर, गोरी किशोरी श्री राधा अपनी सखियों के झुंड के बीच से आगे बढ़कर, हाथों में अबीर लेकर श्यामसुन्दर के कपोलों (गालों) पर प्रेमपूर्वक लगाती हैं। [2]

उधर, बाँके बिहारी अपनी स्वर्ण पिचकारी तानकर रंग की बौछार कर रहे हैं। श्री लाल बलबीर कहते हैं ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो श्री कृष्ण के अंग-अंग से प्रेम रूपी रंग छलक रहा हो । [3]

छतों से, छज्जों से, झरोखों से, और हर ओर से आज नन्दलाल (श्री कृष्ण) के ऊपर लोग गुलाल बरसा रहे हैं। [4]