कब इन नयननितै लखूँ वृन्दावन की धूरि - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (2)

कब इन नयननितै लखूँ वृन्दावन की धूरि - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (2)

कब इन नयननितै लखूँ, वृन्दावन की धूरि ।
जो रसिकनिकी परम प्रिय, पावन जीवन मूरि॥

- श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (2)

मैं अपने इन नेत्रों से वृन्दावन की उस परम-पावन रज के दर्शन कब करूँगा, जो रसिकों को परम प्रिय है एवं उनके जीवन का आधार है।