(सवैया)
खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को, ता मुख की उपमा किहिं दीजै ।
देखत ही बनि आवै भलै, रसखान कहा है जो बार न कीजै ॥ [1]
ज्यौं ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै, एक लई यह दूसरी लीजै ।
त्यौं त्यौं छबीलो छकै छबि छाक सों, हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
एक सखी अन्य सखी से फागलीला का वर्णन करते हुए कहती है कि हे सखी! मैंने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा को फाग (होली) खेलते हुए देखा है। उनके मुखों की सुंदरता की उपमा भला किससे दी जा सकती है? वह छवि तो केवल देखते ही बनती है, ऐसी कौन सी वस्तु है जिसे उस छवि पर न्योछावर न कर दिया जाए? [1]
जैसे-जैसे छबीली श्री राधा अपनी पिचकारी चलाकर कहती हैं, "एक तो यह लो और अब यह दूसरी भी लो," वैसे-वैसे छबीले श्री कृष्ण उनकी उस अपूर्व सुंदरता के रस में छकते जाते हैं। वे बस उन्हें निहारते रहते हैं, हँसते हैं, और वहाँ से हटते नहीं हैं, बल्कि खड़े-खड़े पूरी तरह भीगते रहते हैं मानो वे राधा के प्रेम-रंग में भीग रहे हों। [2]
खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को, ता मुख की उपमा किहिं दीजै ।
देखत ही बनि आवै भलै, रसखान कहा है जो बार न कीजै ॥ [1]
ज्यौं ज्यौं छबीली कहै पिचकारी लै, एक लई यह दूसरी लीजै ।
त्यौं त्यौं छबीलो छकै छबि छाक सों, हेरै हँसे न टरै खरौ भीजै॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
एक सखी अन्य सखी से फागलीला का वर्णन करते हुए कहती है कि हे सखी! मैंने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा को फाग (होली) खेलते हुए देखा है। उनके मुखों की सुंदरता की उपमा भला किससे दी जा सकती है? वह छवि तो केवल देखते ही बनती है, ऐसी कौन सी वस्तु है जिसे उस छवि पर न्योछावर न कर दिया जाए? [1]
जैसे-जैसे छबीली श्री राधा अपनी पिचकारी चलाकर कहती हैं, "एक तो यह लो और अब यह दूसरी भी लो," वैसे-वैसे छबीले श्री कृष्ण उनकी उस अपूर्व सुंदरता के रस में छकते जाते हैं। वे बस उन्हें निहारते रहते हैं, हँसते हैं, और वहाँ से हटते नहीं हैं, बल्कि खड़े-खड़े पूरी तरह भीगते रहते हैं मानो वे राधा के प्रेम-रंग में भीग रहे हों। [2]

