आज सखि वन की सोभा देखि - श्री ठाकुर दास जी

आज सखि वन की सोभा देखि - श्री ठाकुर दास जी

आज सखि वन की सोभा देखि ।
विमल कमल रंग अति फूले, जमुना जलहि विसेखि । [1]
सारस हंस परस्पर नाचत, कोक पपहिया पेखि ।
मोर चकोर सोर पिक भावै, गावत अति रस रेखि ॥ [2]
लता ललित चहुँ दिसि रस झूमीं, इनकी तरफ निरेखि ।
ठाकुर सखी या छबि कूँ देखत, श्री हरिदासि समेखि ॥ [3]

- श्री ठाकुर दास, श्री ठाकुर दास जी की वाणी, पद (3)

एक सखी दूसरी सखी से कहती है—"हे सखि! आज श्री वृन्दावन के वन की अनुपम शोभा तो देखो! श्री यमुना जी के पावन जल में निर्मल कमल के फूल अत्यंत खिले हुए हैं, जिनकी छटा देखते ही बनती है।" [1] 

वहाँ सारस और हंस परस्पर नृत्य कर रहे हैं और कोकिल और पपिहा को देखकर (मन और) अधिक प्रसन्न हो रहा है। मोर, चकोर और कोयल का मधुर कलरव मन को बहुत भा रहा है, और वे सभी रस में उन्मत्त होकर, प्रेम के गीत गा रहे हैं। [2]

सुंदर लताएँ चारों दिशाओं में आनंद से झूम रही हैं। श्री ठाकुर सखी कहती हैं कि सखियाँ इस अलौकिक छवि का दर्शन कर रही हैं, जहाँ स्वामी श्री हरिदास जी अपने आराध्य श्री राधा-कृष्ण (श्री कुंजबिहारी-बिहारिणी) के संग साक्षात् विराजमान हैं। [3]