दया प्रेम उनमत्त जे तन की तनि सुधि नाहिं - श्री दयाबाई

दया प्रेम उनमत्त जे तन की तनि सुधि नाहिं - श्री दयाबाई

'दया' प्रेम उनमत्त जे, तन की तनि सुधि नाहिं।
झुके रहैं हरि रस छके, थके नेम ब्रत नाहिं ॥

- श्री दयाबाई

दयाबाई जी कहती हैं कि जो भक्त प्रभु-प्रेम में मग्न हो जाते हैं, उन्हें अपने तन की रत्ती भर भी सुध-बुध नहीं रहती। वे श्रीहरि के रस में ऐसे डूबे रहते हैं कि उनके लिए नियम, व्रत और कर्मकाण्ड आदि का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता।