लग्यौ नेह सब भाँति निभैहौ।
ये मेरे मन सुदृढ़ भरोसौ, बाँह गहे की लाज लजैहौ ॥ [1]
लोक वेद परलोक जाति कुल, पाप पुण्य दुख द्वन्द छुड़ैहौ।
'भोरी' आपनि जानि कृपा करि, श्री पद पंकज सुबस बसैहौ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (415)
हे प्यारी जू! आपसे मेरा जो यह प्रेम-संबंध जुड़ गया है, मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इसे हर प्रकार से निभाएँगी। मेरे मन में यह दृढ़ भरोसा है कि आप अपने सहज स्वभाव के अनुसार जिसका हाथ पकड़ लेती हैं, उसे पूर्णतः अपना बना लेती हैं; अर्थात् आप अपने शरणागत की लाज अवश्य रखेंगी। [1]
श्री भोरी सखी कहती हैं कि ऐसी कृपा करें कि इस लोक की मर्यादा, वेदों के बंधन, परलोक की चिंता, जाति-कुल के अभिमान तथा पाप-पुण्य के द्वन्द्वों से मुक्त करके सदा के लिए अपने श्रीचरण-कमलों के आश्रय में ही वास दें। [2]
ये मेरे मन सुदृढ़ भरोसौ, बाँह गहे की लाज लजैहौ ॥ [1]
लोक वेद परलोक जाति कुल, पाप पुण्य दुख द्वन्द छुड़ैहौ।
'भोरी' आपनि जानि कृपा करि, श्री पद पंकज सुबस बसैहौ॥ [2]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (415)
हे प्यारी जू! आपसे मेरा जो यह प्रेम-संबंध जुड़ गया है, मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप इसे हर प्रकार से निभाएँगी। मेरे मन में यह दृढ़ भरोसा है कि आप अपने सहज स्वभाव के अनुसार जिसका हाथ पकड़ लेती हैं, उसे पूर्णतः अपना बना लेती हैं; अर्थात् आप अपने शरणागत की लाज अवश्य रखेंगी। [1]
श्री भोरी सखी कहती हैं कि ऐसी कृपा करें कि इस लोक की मर्यादा, वेदों के बंधन, परलोक की चिंता, जाति-कुल के अभिमान तथा पाप-पुण्य के द्वन्द्वों से मुक्त करके सदा के लिए अपने श्रीचरण-कमलों के आश्रय में ही वास दें। [2]

