काम न आवै कौन हूँ, अति अपरस आचार ।
अंत निबाहै प्रेम हीं, छाँडे खाट कौ द्वार ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (364)
बहुत से लोग जन्मभर अपरस-सपरस अथवा बाह्य आचार-विचार में उलझे रहते हैं। मृत्यु के समय जब जीव खाट छोड़कर आगे की यात्रा पर जाता है, तब केवल भगवान से किया गया सच्चा प्रेम ही काम आता है और वही माया-सागर से पार करा सकता है; अन्य कुछ नहीं।
अंत निबाहै प्रेम हीं, छाँडे खाट कौ द्वार ॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (364)
बहुत से लोग जन्मभर अपरस-सपरस अथवा बाह्य आचार-विचार में उलझे रहते हैं। मृत्यु के समय जब जीव खाट छोड़कर आगे की यात्रा पर जाता है, तब केवल भगवान से किया गया सच्चा प्रेम ही काम आता है और वही माया-सागर से पार करा सकता है; अन्य कुछ नहीं।

