आज खेलें होरी नव नागरी - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (151)

आज खेलें होरी नव नागरी - श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (151)

(राग परज)
आज खेलें होरी नव नागरी ।
सरस गुलाल डार प्रीतम पै, सकल कला गुन आगरी ॥ [1]
श्रीवृषभान भवन में सजनी, फैलि रह्यौ अनुराग री।
कीरति कुल कीरति गावति लखि, गोबिंदसरन बड़भाग री ॥ [2]

- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (151)

आज परम नागरी, श्री राधा महारानी होली खेल रही हैं। वे समस्त कलाओं और गुणों की खान हैं, और अपने प्रियतम श्री कृष्ण पर अत्यंत प्रेमपूर्वक गुलाल डाल रही हैं। [1]

हे सजनी! वृषभानु जी के भवन में चारों ओर दिव्य अनुराग रस छाया हुआ है। माता कीर्ति और उनका कुल श्री राधा जी के यश का गान कर रहा है। श्री गोविंद शरण देवाचार्य कहते हैं कि इस अलौकिक दृश्य को देखकर वे स्वयं को परम सौभाग्यशाली मान रहे हैं। [2]