कुंज महल रंग हो हो होरी - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (15)

कुंज महल रंग हो हो होरी - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (15)

(राग गौरी)
कुंज महल रंग हो हो होरी,
खेलत नवल किशोर किशोरी।
बाजत ताल मृदंग झांझ ढप
अबीरगुलाल उडावत झोरी॥ [1]
नाचत सखी जन झमक मिल मिल
गावति गारि लाल सों जोरी।
हंसत हंसावति निज स्वामिन कों,
श्री ललित सखी जैश्री बंशी अलि मोरी ॥ [2]

- श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (15)

निकुंज रूपी महल में होली के रंगों की धूम मची हुई है, जहाँ नित्य किशोर श्री कृष्ण और नित्य किशोरी श्री राधा प्रेम की होली खेल रहे हैं। ताल, मृदंग, झाँझ और ढप जैसे वाद्य यंत्र बज रहे हैं और झोलियों से भर-भर कर अबीर और गुलाल उड़ाया जा रहा है। [1]

सखियाँ मिल-जुलकर झंकार के साथ नृत्य कर रही हैं और प्रियतम श्री लाल जी (कृष्ण) को सामूहिक रूप से मधुर व्यंग्यात्मक गालियाँ (होली के पद) गाकर सुना रही हैं। श्री वंशी अलि जय-जयकार करते हुए कहते हैं कि उनकी गुरु श्री ललिता सखी स्वयं हँसती हैं और अपनी स्वामिनी श्री राधा जू को हँसाती हैं।  [2]