(राग सारंग रसिया)
होरी में लाज न रहे प्यारी।
रसिया फिरत बजावत डफली, गावत लाज भरी गारी॥ [1]
मूंठ गुलाल इतै उत फेंकत, गैल रोक रह्यौ ब्रज नारी।
ललित लड़ैती कठिन है बचिवो, छैल करत ऊधम भारी॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वर्षोत्सव पद (35)
हे प्यारी! इस होली के उत्सव में अब लज्जा और संकोच का कोई स्थान नहीं रह गया है। वह रसिया (कृष्ण) डफली बजाते हुए घूम रहा है और प्रेम भरी (ठिठोली वाली) गालियाँ गा रहा है। [1]
वह मुट्ठी में भर-भरकर गुलाल इधर-उधर फेंक रहा है और ब्रज की नारियों का मार्ग रोक रहा है। श्री ललित लड़ैती कहते हैं कि अब बच निकलना बहुत कठिन है, क्योंकि वह छैल-छबीला (कृष्ण) आज बहुत ऊधम मचा रहा है। [2]
होरी में लाज न रहे प्यारी।
रसिया फिरत बजावत डफली, गावत लाज भरी गारी॥ [1]
मूंठ गुलाल इतै उत फेंकत, गैल रोक रह्यौ ब्रज नारी।
ललित लड़ैती कठिन है बचिवो, छैल करत ऊधम भारी॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, वर्षोत्सव पद (35)
हे प्यारी! इस होली के उत्सव में अब लज्जा और संकोच का कोई स्थान नहीं रह गया है। वह रसिया (कृष्ण) डफली बजाते हुए घूम रहा है और प्रेम भरी (ठिठोली वाली) गालियाँ गा रहा है। [1]
वह मुट्ठी में भर-भरकर गुलाल इधर-उधर फेंक रहा है और ब्रज की नारियों का मार्ग रोक रहा है। श्री ललित लड़ैती कहते हैं कि अब बच निकलना बहुत कठिन है, क्योंकि वह छैल-छबीला (कृष्ण) आज बहुत ऊधम मचा रहा है। [2]

