(राग धमाल व होरी का रसिया)
दोऊँ मगन भये रस होरी में ।
दै गलबैंयाँ लाल लड़ैती, बंधे प्रेम की डोरी में ॥ [1]
मृदु मुस्कावत चित्त चुरावत, लें गुलाल कर झोरी में ।
“रूपमाधुरी” रंग बढ़ो है, कुंवर किशोर किशोरी में ॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (172)
श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं। [1]
वे मंद-मंद मुस्कराते हुए एक-दूसरे का चित्त चुरा रहे हैं और अपनी झोलियों से मुट्ठियों में गुलाल भर रहे हैं। श्री रूपमाधुरी कहते हैं कि कुँवर किशोर और कुँवरी किशोरी के मध्य प्रेम का यह रंग निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। [2]
दोऊँ मगन भये रस होरी में ।
दै गलबैंयाँ लाल लड़ैती, बंधे प्रेम की डोरी में ॥ [1]
मृदु मुस्कावत चित्त चुरावत, लें गुलाल कर झोरी में ।
“रूपमाधुरी” रंग बढ़ो है, कुंवर किशोर किशोरी में ॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (172)
श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) दोनों ही होली के दिव्य रस में पूरी तरह मग्न हैं। लाल (कृष्ण) और लाड़ैती (राधा) एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए हैं और प्रेम की अटूट डोरी में बंधे हुए हैं। [1]
वे मंद-मंद मुस्कराते हुए एक-दूसरे का चित्त चुरा रहे हैं और अपनी झोलियों से मुट्ठियों में गुलाल भर रहे हैं। श्री रूपमाधुरी कहते हैं कि कुँवर किशोर और कुँवरी किशोरी के मध्य प्रेम का यह रंग निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। [2]

