श्रीवृन्दाविपिनेश्वरी हृदिगतं प्रेमैव - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (47)

श्रीवृन्दाविपिनेश्वरी हृदिगतं प्रेमैव - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (47)

श्रीवृन्दाविपिनेश्वरी हृदिगतं प्रेमैव कुण्डच्छलात्
मन्ये प्रास्वदन्तरेऽपरिमितं वृद्धं भृशं निर्गतम् ।
यद्‌गोपाल वरेण्यसूनुसहितान् सर्वान् स्वशोभाचयै
मूर्च्छा प्रापयति प्रमोदसुधया कृत्वा किल क्षालितान्॥

- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (47)

यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि मानो वृन्दावनेश्वरि, श्री राधा महारानी के हृदय में स्थित प्रेम ही इस कुंड (श्री राधाकुंड) के रूप में बाह्य रूप से प्रकट हुआ है। वह प्रेम अपरिमित रूप से बढ़कर बाहर प्रवाहित हो रहा है। अपनी अनुपम शोभा-समूह से वह गोपराजनन्दन (श्री कृष्ण) सहित सभी को मूर्छित कर देता है और फिर प्रमोद-सुधा में स्नान कराकर उन्हें पूर्णतः धौत कर देता है।