वृन्दावन महिमा अपरम्पार - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (32)

वृन्दावन महिमा अपरम्पार - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (32)

वृन्दावन महिमा अपरम्पार ।
श्यामसुन्दर भोक्ता रस श्यामा वृन्दावन आधार॥ [1]
तीनों तीनों का पूरक मिलि होबत नित्य विहार।
दो मिले एक नहिं संग होवे तो नहिं लीला विस्तार॥ [2]
दो मिले कुरुक्षेत्र में फिर भी नहिं हिय रस संचार।
वृन्दावन तन प्राण हैं राधा मन हैं नन्दकुमार॥ [3]
भजहु संग करि इन तीनन तब होवै सुख साकार।
‘राधाचरणदास' बिनु इनके रस साधन बेकार॥ [4]

- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (32)

श्री वृन्दावन धाम की महिमा अनंत और अपार है। यहाँ श्यामसुन्दर रसास्वादन करने वाले भोक्ता हैं, श्री श्यामा जू (राधा) साक्षात् रस स्वरूपा हैं, और वृन्दावन इन दोनों की लीलाओं का आधार है। [1]

ये तीनों तत्व (राधा, कृष्ण, वृंदावन) एक-दूसरे के पूरक हैं और इन तीनों के संयोग से ही 'नित्य विहार' सिद्ध होता है। यदि इन तीनों में से कोई एक भी न हो, तो वह नित्य लीला का विस्तार संभव नहीं है। [2]

यद्यपि श्री राधा एवं श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र में भी एक बार मिले थे, परंतु वहाँ हृदय में उस निकुंज-रस का संचार नहीं हुआ (क्योंकि वहाँ वृन्दावन का परिवेश नहीं था)। वृन्दावन तन है, राधा प्राण हैं और श्री कृष्ण उसका मन है । [3]

 'राधाचरणदास' कहते हैं कि जब जीव इन तीनों (राधा, कृष्ण और वृन्दावन) का एक साथ भजन करता है, तभी वास्तविक रस (नित्य विहार) का आस्वादन होता है अथवा इन तीनों के बिना यह रसोपासना बेकार है। [4]