सजन कुटुंब परिजन बढ़े, सुत-दारा-धन-धाम।
महामूढ़ विषयी भयौ, चित आकर्षो काम॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (325.21)
जैसे-जैसे तेरे प्रियजन, कुटुम्ब और परिवार का विस्तार होता गया, और पुत्र, पत्नी, धन तथा वैभव बढ़ते गए, वैसे-वैसे तू विषयासक्त होकर भ्रमित होता गया। सांसारिक इच्छाओं और कामनाओं ने तेरे चित्त को इस प्रकार बांध लिया कि तू अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को ही भूल बैठा। अरे मूर्ख! क्या इसी को तू अपनी विजय समझ बैठा है? स्मरण कर—तेरा जन्म केवल भगवद्प्राप्ति और आत्मोद्धार के लिए हुआ था।
महामूढ़ विषयी भयौ, चित आकर्षो काम॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (325.21)
जैसे-जैसे तेरे प्रियजन, कुटुम्ब और परिवार का विस्तार होता गया, और पुत्र, पत्नी, धन तथा वैभव बढ़ते गए, वैसे-वैसे तू विषयासक्त होकर भ्रमित होता गया। सांसारिक इच्छाओं और कामनाओं ने तेरे चित्त को इस प्रकार बांध लिया कि तू अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को ही भूल बैठा। अरे मूर्ख! क्या इसी को तू अपनी विजय समझ बैठा है? स्मरण कर—तेरा जन्म केवल भगवद्प्राप्ति और आत्मोद्धार के लिए हुआ था।

