देश देशान्तर के अनेक - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (9)

देश देशान्तर के अनेक - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (9)

(कवित्त)
देश देशान्तर के अनेक व्यक्ति आते यहाँ,
जिनके हृदय में जलती प्रेम-ज्वाला है। [1]
गोपी गुरु गौरव से राज रहे कुञ्जन में,
पाकर प्रवेश होता चित्त मतवाला है ॥ [2]
प्रेम की परीक्षा होती प्रेम का ही प्रश्नपत्र,
प्रेम का प्रमाण-पत्र मिलता निराला है। [3]
उद्धव से शिष्य जहाँ आये पाठ पढ़ने को,
वन्दावन प्रेम की पवित्र पाठशाला है ॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (9)

देश-देशान्तर के अनेक व्यक्ति यहाँ खिंचे चले आते हैं, जिनके हृदय में प्रेम की प्रज्वलित ज्वाला धधक रही है। [1]

यहाँ के कुञ्जों में गोपियाँ गुरु के गौरवमय पद पर प्रतिष्ठित होकर सुशोभित हैं। इन कुञ्जों में प्रवेश पाते ही साधक का चित्त प्रेम के आनंद में मतवाला हो जाता है। [2]

यहाँ प्रेम की ही परीक्षा होती है और प्रेम का ही प्रश्नपत्र होता है। उत्तीर्ण होने पर प्रेम का ही निराला प्रमाण-पत्र मिलता है। [3]

स्वयं उद्धव जैसे परम ज्ञानी भी जहाँ प्रेम का पाठ पढ़ने के लिए शिष्य बनकर आए, वह श्री वृन्दावन धाम, प्रेम की अत्यंत पवित्र पाठशाला है। [4]