माखन तें मखतूलहू तें - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (79)

माखन तें मखतूलहू तें - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (79)

(सवैया)
माखन तें मखतूलहू तें, सुकुमार सिरोमन कञ्ज कली के । [1]
लाल गुलाल प्रवाल के भूषन, दूषन हैं घनश्याम छली के ॥ [2]
आली गुलाब को आबहि वारिये, चारिये ये ब्रजकुञ्ज थली के । [3]
भानु प्रताप कौ निंदित है, पद बंदत हौं वृषभानलली के॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (79)

श्री वृषभानु-नंदिनी के चरण-कमल मक्खन और रेशम से भी अधिक कोमल हैं। वे कमल की कलियों से भी अधिक सुकुमार हैं। [1]

वे चरण गुलाल और मूंगा रत्न के स्मान लाल हैं, जो घनश्याम (श्री कृष्ण) की सुंदरता के मान का भी मर्दन करने वाले हैं। [2]

हे सखी! गुलाब की आभा और कांति को भी उन चरणों पर न्योछावर कर देना चाहिए। वे चरण ब्रज-भूमि के कुञ्जों में विहार करते हैं। [3]

सूर्य का प्रताप भी उन चरणों की दीप्ति के सम्मुख फीका और निंदित प्रतीत होता है। श्री हठी जी कहते हैं कि मैं उन्हीं श्री श्री राधा महारानी जू के चरणों की वंदना करता हूँ। [4]