व्यास रसिक निर्णय कियौ, श्रीवृंदावन माँहिं ।
श्रीस्वामी के धर्म कौ, पटतर कौं कोइ नाहिं॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (356)
श्रीधाम वृन्दावन में रसिक-समाज के मध्य गहन विचार के उपरांत, श्री हरिराम व्यास जी ने यह निष्कर्ष स्थापित किया कि रसिक अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' के समान अन्य कोई उपासना मार्ग नहीं है। यह रस-पद्धति अद्वितीय है, जिसमें निरंतर केवल प्रिया-प्रियतम के अखंड विहार का ही अनन्य भाव से भजन किया जाता है। अतः इसकी तुलना किसी अन्य साधन-पथ से संभव नहीं है।
श्रीस्वामी के धर्म कौ, पटतर कौं कोइ नाहिं॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (356)
श्रीधाम वृन्दावन में रसिक-समाज के मध्य गहन विचार के उपरांत, श्री हरिराम व्यास जी ने यह निष्कर्ष स्थापित किया कि रसिक अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' के समान अन्य कोई उपासना मार्ग नहीं है। यह रस-पद्धति अद्वितीय है, जिसमें निरंतर केवल प्रिया-प्रियतम के अखंड विहार का ही अनन्य भाव से भजन किया जाता है। अतः इसकी तुलना किसी अन्य साधन-पथ से संभव नहीं है।

