विहारिणि सर्वोपरि शिरताज - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

विहारिणि सर्वोपरि शिरताज - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

विहारिणि सर्वोपरि शिरताज ॥ टेक ॥ [1]
रहत विहारी आज्ञाकारी, सहचरि संग समाज ।
कुञ्ज निकुञ्जन रसमय पुञ्जन, सहज भरी सुखसाज ॥ [2]
वन रजधानी रस सरसानी, अद्भुत अचल सुराज ।
अलीमाधुरी कृपा दृष्टि से, पूरे तन मन काज ॥ [3]

- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

श्री विहारिणी जी (श्री राधा) ही सर्वोपरि हैं और सभी की सिरताज (शिरोमणि) स्वामिनी हैं। [1]

साक्षात् श्री बिहारी जी (श्री कृष्ण) भी सदैव उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और वे अपनी सखियों के समूह के संग शोभायमान रहती हैं। समस्त कुंज-निकुंज रसमय पुंजों से भरे हैं, जहाँ स्वाभाविक रूप से ही रस की अविरल धारा बहती रहती है। [2]

श्री वृन्दावन धाम ही उनकी राजधानी है, जहाँ वे सदा प्रेम-रस में निमग्न रहती हैं और जहाँ उनका अखण्ड राज है। श्री अलीमाधुरी जी कहते हैं कि श्री राधा महारानी जू की केवल एक कृपामयी दृष्टि ही ऐसी सामर्थ्य रखती है कि उससे तन और मन के समस्त मनोरथ स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं। [3]