श्री हित हरिवंश गुसाईं बिनु को राधाराधन जानै।
श्री स्वामी हरिदास बिना को जुगल रूप उर आनै॥ [1]
श्री वृन्दावन रसिकन कौ व्यासहिं तजि कौन बखानै।
तिन ही कौ जग जनम सफल जिनकौं ये अपनों मानैं॥ [2]
नंद सुवन की बालकेलि को रस वल्लभ ही पायौ ।
महाप्रभू श्री कृष्ण नाम की महिमा रस बरसायौ॥ [3]
रूप-सनातन जू नैं ब्रज-रस निजु रसना दुलरायौ ।
सोई भलीविधि नाभाजू नैं भक्तिमाल दरसायौ॥ [4]
- श्री किशोरी अलि जी, माँझ (01)
श्री हित हरिवंश गोस्वामी जी के बिना श्री राधा की अनन्य और अंतरंग उपासना का वास्तविक रहस्य कौन जान सकता है? और श्री स्वामी हरिदास जी के बिना युगल-स्वरूप को नित्य हृदय में धारण करने की सामर्थ्य किसमें है? [1]
श्री वृन्दावन के रसिक संतों की महिमा का यथार्थ वर्णन भी श्री हरिराम व्यास जी जैसे महापुरुष ही कर सकते हैं। वास्तव में इस संसार में उन्हीं भक्तों का जन्म धन्य और सफल है, जिन्हें इन रसिक संतों की कृपा प्राप्त हुई है या जिन्होंने उन्हें अपना आध्यात्मिक आश्रय मान लिया है। [2]
नंदनंदन श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं के मधुर रस का पूर्ण आस्वादन श्री वल्लभाचार्य जी ने किया है, और श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने ‘श्री कृष्ण’ नाम की महिमा का ऐसा अनुपम रस-वर्षण किया कि समस्त संसार उस प्रेमधारा से आप्लावित हो उठा। [3]
श्री रूप और सनातन गोस्वामी जी ने अपनी वाणी से ब्रज-रस की अद्भुत और गूढ़ महिमा का निरूपण किया। उसी दिव्य भक्त-परंपरा और संत-महिमा को नाभाजी ने ‘भक्तमाल’ में अत्यंत सुंदर और स्पष्ट रूप से प्रकट किया है। [4]
श्री स्वामी हरिदास बिना को जुगल रूप उर आनै॥ [1]
श्री वृन्दावन रसिकन कौ व्यासहिं तजि कौन बखानै।
तिन ही कौ जग जनम सफल जिनकौं ये अपनों मानैं॥ [2]
नंद सुवन की बालकेलि को रस वल्लभ ही पायौ ।
महाप्रभू श्री कृष्ण नाम की महिमा रस बरसायौ॥ [3]
रूप-सनातन जू नैं ब्रज-रस निजु रसना दुलरायौ ।
सोई भलीविधि नाभाजू नैं भक्तिमाल दरसायौ॥ [4]
- श्री किशोरी अलि जी, माँझ (01)
श्री हित हरिवंश गोस्वामी जी के बिना श्री राधा की अनन्य और अंतरंग उपासना का वास्तविक रहस्य कौन जान सकता है? और श्री स्वामी हरिदास जी के बिना युगल-स्वरूप को नित्य हृदय में धारण करने की सामर्थ्य किसमें है? [1]
श्री वृन्दावन के रसिक संतों की महिमा का यथार्थ वर्णन भी श्री हरिराम व्यास जी जैसे महापुरुष ही कर सकते हैं। वास्तव में इस संसार में उन्हीं भक्तों का जन्म धन्य और सफल है, जिन्हें इन रसिक संतों की कृपा प्राप्त हुई है या जिन्होंने उन्हें अपना आध्यात्मिक आश्रय मान लिया है। [2]
नंदनंदन श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं के मधुर रस का पूर्ण आस्वादन श्री वल्लभाचार्य जी ने किया है, और श्री चैतन्य महाप्रभु जी ने ‘श्री कृष्ण’ नाम की महिमा का ऐसा अनुपम रस-वर्षण किया कि समस्त संसार उस प्रेमधारा से आप्लावित हो उठा। [3]
श्री रूप और सनातन गोस्वामी जी ने अपनी वाणी से ब्रज-रस की अद्भुत और गूढ़ महिमा का निरूपण किया। उसी दिव्य भक्त-परंपरा और संत-महिमा को नाभाजी ने ‘भक्तमाल’ में अत्यंत सुंदर और स्पष्ट रूप से प्रकट किया है। [4]

