पानी का सा बुलबुला यह तन ऐसा होय - श्री सहजोबाई

पानी का सा बुलबुला यह तन ऐसा होय - श्री सहजोबाई

पानी का सा बुलबुला यह तन ऐसा होय।
पीव मिलन की ठानिये रहिये ना पड़ि सोय ॥ [1]
रहिये ना पड़ि सोय बहुर नहिं मनुखा देही।
आपन ही कूँ खोज मिलै जब राम सनेही ॥ [2]
हरि कूँ भूले जो फिरैं सहजो जीवन छार।
सुखिया जब ही होयगो सुमिरैगो करतार ॥ [3]

- श्री सहजोबाई

यह शरीर पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। अतः अपने प्रियतम (परमात्मा) से मिलने का दृढ़ संकल्प कर लेना चाहिए और प्रमाद की नींद में सोए नहीं रहना चाहिए। [1]

आलस्य में मत पड़े रहो, क्योंकि यह मानव देह बार-बार प्राप्त नहीं होती। अपने भीतर ही भगवान को खोजो, तभी उस स्नेही 'राम' (परमात्मा) से मिलन संभव होगा। [2]

सहजोबाई कहती हैं कि जो लोग श्री हरि को भूलकर भटकते रहते हैं, उनका जीवन राख के समान व्यर्थ है। जीव तभी सुखी होगा, जब वह अपने करतार (सृष्टिकर्ता) का स्मरण करेगा। [3]