(कवित्त)
प्रेम के हिंडोरे बलि झूलति हैं प्रिया प्रिय,
नील पीत बागे बने सोभा उछरत है । [1]
बोलनि हँसनि गान एक रस रमकि तीन,
मान सों रमकि झोटा स्वास न भरत है ॥ [2]
भौंह की मरोर में अनंग अंग पावैं कोर,
बोरि बोरि रंग अङ्ग अंगनि धरत हैं । [3]
राधिकारमण भारि 'मनोहर' चह चारी,
लोइनि चतुर चारि खंजन लरत हैं ॥ [4]
- श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (109)
बलिहारी है आज प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) प्रेम के हिंडोले (झूले) में झूल रहे हैं। उन्होंने नीले और पीले वस्त्र धारण किए हैं, जिनकी आभा चारों ओर छलक रही है। [1]
उनका आपस में बोलना, हँसना और गान करना—सब एक ही रस में डूबा हुआ है। बीच-बीच में मधुर मान की झलक से मानो मन एक क्षण को ठहर-सा जाता है। [2]
किशोरीजी की भौंहों की हल्की मरोड़ में ही अनंग (कामदेव) का पूरा साम्राज्य जाग उठता है। वे बार-बार प्रेम-रंग में डूबकर एक-दूसरे के अंग-अंग पर प्रेम का रंग चढ़ाते चले जाते हैं। [3]
श्री मनोहरदास कहते हैं कि दिव्य दंपति श्री राधारमण एक दूसरे की ओर ऐसी उत्सुकता से निहारते हैं मानो दोनों के चतुर नेत्र खंजन पक्षी की तरह लरते हैं, यानी कटाक्ष-खेल में इधर-उधर फुर्ती से डोलते रहते हैं। [4]
प्रेम के हिंडोरे बलि झूलति हैं प्रिया प्रिय,
नील पीत बागे बने सोभा उछरत है । [1]
बोलनि हँसनि गान एक रस रमकि तीन,
मान सों रमकि झोटा स्वास न भरत है ॥ [2]
भौंह की मरोर में अनंग अंग पावैं कोर,
बोरि बोरि रंग अङ्ग अंगनि धरत हैं । [3]
राधिकारमण भारि 'मनोहर' चह चारी,
लोइनि चतुर चारि खंजन लरत हैं ॥ [4]
- श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (109)
बलिहारी है आज प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) प्रेम के हिंडोले (झूले) में झूल रहे हैं। उन्होंने नीले और पीले वस्त्र धारण किए हैं, जिनकी आभा चारों ओर छलक रही है। [1]
उनका आपस में बोलना, हँसना और गान करना—सब एक ही रस में डूबा हुआ है। बीच-बीच में मधुर मान की झलक से मानो मन एक क्षण को ठहर-सा जाता है। [2]
किशोरीजी की भौंहों की हल्की मरोड़ में ही अनंग (कामदेव) का पूरा साम्राज्य जाग उठता है। वे बार-बार प्रेम-रंग में डूबकर एक-दूसरे के अंग-अंग पर प्रेम का रंग चढ़ाते चले जाते हैं। [3]
श्री मनोहरदास कहते हैं कि दिव्य दंपति श्री राधारमण एक दूसरे की ओर ऐसी उत्सुकता से निहारते हैं मानो दोनों के चतुर नेत्र खंजन पक्षी की तरह लरते हैं, यानी कटाक्ष-खेल में इधर-उधर फुर्ती से डोलते रहते हैं। [4]

