अनियारे दीरघ नयन किती न तरुनि समान - ब्रज के दोहे

अनियारे दीरघ नयन किती न तरुनि समान - ब्रज के दोहे

अनियारे दीरघ नयन, किती न तरुनि समान ।
वह चितवनि औरें कुछ, जिहि बस होत सुजान॥

- ब्रज के दोहे

इस संसार में ऐसी कितनी ही युवतियाँ हैं जिनकी आँखें तीक्ष्ण और विशाल हैं, किंतु श्री राधा के नेत्रों की वह चितवन (दृष्टि) कुछ और ही अलौकिक है, जिसकी केवल एक कटाक्ष मात्र से परम चतुर सुजान स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी वश में हो जाते हैं।