दरसन दै मोरमुकुट वारे - श्री पुरुषोत्तम जी

दरसन दै मोरमुकुट वारे - श्री पुरुषोत्तम जी

दरसन दै मोरमुकुट वारे ।
कटितट राजत सुभग काछनी, फरकत पीरे पटवारे ॥ [1]
वृन्दावन में धेनु चरावैं, बाजत वंशीवट वारे ।
पुरुषोत्तम प्रभु के गुन गावैं, शेष सहस मुख रट हारे ॥ [2]

- श्री पुरुषोत्तम जी

हे मोरमुकुट से शोभायमान श्री कृष्ण! कृपा करके मुझे अपने दर्शन प्रदान कीजिए। आपकी कमर पर बँधी सुंदर काछनी अत्यंत मनोहर प्रतीत होती है और आपके पीतवर्ण वस्त्र मंद पवन में लहराकर अद्भुत शोभा बिखेर रहे हैं। [1]

आप वृन्दावन की गलियों में गायें चराते हैं और वंशीवट पर अपनी मधुर बाँसुरी बजाते हैं। श्री पुरुषोत्तम प्रभु श्री कृष्ण के गुणों का गान करते हैं, जिनकी महिमा का वर्णन करते हुए हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी हार गए हैं। [2]