श्रीहरिदास सरन हौं आयौ ।
झूठे सब बंधान जगत के छूटे, सुचि सुख पायौ ॥ [1]
कुंज महल की गौर स्याम छबि, मत्त भयौ उर लायौ ।
‘कान्त रसिक’ के स्याम किसोरी, हुलसि हुलसि जस गायौ ॥ [2]
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, पद (35)
जब से मैं अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी की शरण में आया हूँ, तब से संसार के सभी झूठे बंधन छूट गए हैं और मुझे परम उज्ज्वल रस की प्राप्ति हुई है। [1]
कुंज-महल में विराजमान श्री राधा (गौर) और श्री कृष्ण (श्याम) की छवि को मैंने उन्मत्त होकर अपने हृदय में धारण कर लिया है। श्री कान्त रसिक जी अब अपने आराध्य युगल, श्री श्यामा-कुंजबिहारी, का पुलकित होकर यशोगान कर रहे हैं। [2]
झूठे सब बंधान जगत के छूटे, सुचि सुख पायौ ॥ [1]
कुंज महल की गौर स्याम छबि, मत्त भयौ उर लायौ ।
‘कान्त रसिक’ के स्याम किसोरी, हुलसि हुलसि जस गायौ ॥ [2]
- श्री कान्त किशोर, कान्त रसिक जी की वाणी, पद (35)
जब से मैं अनन्य नृपति स्वामी श्री हरिदास जी की शरण में आया हूँ, तब से संसार के सभी झूठे बंधन छूट गए हैं और मुझे परम उज्ज्वल रस की प्राप्ति हुई है। [1]
कुंज-महल में विराजमान श्री राधा (गौर) और श्री कृष्ण (श्याम) की छवि को मैंने उन्मत्त होकर अपने हृदय में धारण कर लिया है। श्री कान्त रसिक जी अब अपने आराध्य युगल, श्री श्यामा-कुंजबिहारी, का पुलकित होकर यशोगान कर रहे हैं। [2]

