पुज्यं तच्चरणं ब्रजेन्द्रविपिनं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.44)

पुज्यं तच्चरणं ब्रजेन्द्रविपिनं - श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.44)

पुज्यं तच्चरणं ब्रजेन्द्रविपिनं वृन्दावनं याति यद्
धन्या सा रसना रसलायमहो वृन्दावनं स्तौति या ।
पुण्यं तद्दृदयं सुहृद्यमटवीराजं सदा ध्यायते
मान्यो ब्रह्मभवादिभिश्च निवसत्यस्मिन्वने यो नर: ॥

- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.44)

वे चरण परम पूज्य हैं, जो श्रीव्रजेन्द्रनन्दन के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन की यात्रा करते हैं। वह रसना धन्य है, जो इस रसमन्दिर वृन्दावन की स्तुति करती है। वह हृदय परम पवित्र है, जो इस परम मनोरम विपिन का सदा चिन्तन करता है। तथा जो मनुष्य श्रीवृन्दावन में निवास करता है, वह तो ब्रह्मा और शिव आदि के लिए भी सम्माननीय है।