हिंडोरे झूलत री सुरंग चूनरी पहिरें - श्री हित रूप लाल

हिंडोरे झूलत री सुरंग चूनरी पहिरें - श्री हित रूप लाल

(राग मलार)
हिंडोरे झूलत री सुरंग चूनरी पहिरें ।
झुलवत ललन बिहारी वारी, उठति छबिनु की लहरें ॥ [1]
घन गरजनि झुकि अलि गन गावति, तान-तरंगनि गहरें।
(जयश्री) ‘रूपलाल हित’ रस बस दम्पति, लखि उपमा नहिं ठहरें ॥ [2]

- श्री हित रूप लाल

सुंदर रंगों वाली चुनरी धारण किए श्री प्रिया जी मनोहर हिंडोले में झूल रही हैं। उनके प्रियतम लाल बिहारी बड़े अनुराग और उत्साह से उन्हें झुला रहे हैं और प्रेमवश बार-बार उन पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर रहे हैं। श्री राधा के अनुपम सौंदर्य की लहरें चारों ओर छा रही हैं। [1]

मेघों की गर्जना के बीच सखियाँ गहरी तान और मधुर तरंगों में राग मल्हार का गान कर रही हैं।। श्री हित रूपलाल जी कहते हैं कि रस में निमग्न इस दिव्य दम्पति की अद्वितीय शोभा को देखकर संसार की सभी उपमाएँ तुच्छ प्रतीत हो रही हैं। [2]