रूप गुन गंस के हंस अरु मोर - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (08)

रूप गुन गंस के हंस अरु मोर - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (08)

रूप गुन गंस के हंस अरु मोर,
पिक रहत मद प्रेम के रंग भीने । [1]
कोकिला, सारि, सुक, बिहंग बहु रंग के,
फिरत हैं रैनि-दिन नेह लीने ॥ [2]
मृगी और बाघ अनुराग के रंग भरि,
करत कल केलि मिलि बैर हीने । [3]
आनंद को धाम अभिराम वृन्दाविपिन,
सुमिरि अलबेली अलि हिय हेत दीने ॥ [4]

- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (8)

वृन्दावन के रूप और गुणों के वशीभूत होकर हंस, मोर और कोयल सदैव प्रेम के रंग में सराबोर रहते हैं। [1]

कोयल, मैना, तोते और अनेक रंगों के पक्षी दिन-रात स्नेह में लीन होकर विचरण करते हैं। [2]

यहाँ प्रेम के रंग में भरकर मृगी और बाघ भी अपने जन्मजात वैर को भूलकर परस्पर सुंदर क्रीड़ा करते हैं। [3]

आनंद का यह अनुपम धाम श्री वृन्दावन है, जहाँ की अलबेली ठकुरानी श्री राधा का स्मरण कर, वे अपना हृदय उनके चरणों में समर्पित कर देते हैं। [4]