लोचन स्याम सुधीर के, मोचन विरह विसाल ।
बिन ही अंजन ये अहो, खंजन लोचन बाल॥
- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)
श्रीरंगदेवीजी श्रीललिताजी से कहती हैं- हे श्रीललिते ! श्री राधा के नेत्रों की ओर तो देख ! उनके ये नेत्र खंजन (पक्षी) की भाँति शोभायमान लग रहे हैं। यद्यपि श्रीप्रियाजी ने अपने नेत्रों में अञ्जन-धारण नहीं किया है, तथापि बिना अञ्जन के ही उनके ये खञ्जन-नेत्र वृन्दावन-बिहारी श्रीकृष्ण के हृदय की विरह-व्यथा को नष्ट करने वाले हैं।
बिन ही अंजन ये अहो, खंजन लोचन बाल॥
- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)
श्रीरंगदेवीजी श्रीललिताजी से कहती हैं- हे श्रीललिते ! श्री राधा के नेत्रों की ओर तो देख ! उनके ये नेत्र खंजन (पक्षी) की भाँति शोभायमान लग रहे हैं। यद्यपि श्रीप्रियाजी ने अपने नेत्रों में अञ्जन-धारण नहीं किया है, तथापि बिना अञ्जन के ही उनके ये खञ्जन-नेत्र वृन्दावन-बिहारी श्रीकृष्ण के हृदय की विरह-व्यथा को नष्ट करने वाले हैं।

