कवधौं कृपा लाड़िली ह्वै है - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (124)

कवधौं कृपा लाड़िली ह्वै है - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (124)

(राग खम्माच)
कवधौं कृपा लाड़िली ह्वै है, श्रीवन माहिं वसौंरी।
श्यामाश्याम महाछवि अनुपम, इन नैनन निरखौंरी ॥ [1]
दै गलवांह जुगुलवर राजैं, हों यह सुखै लहौंरी।
सुनियो टेर कृपानिधि राधे, पुनिपुनि विनै कहौंरी ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (124)

प्यारी श्री लाड़िलीजू (श्री राधा) की मुझ पर कब कृपा होगी, कि मैं भी सदा के लिए श्री वृन्दावन में वास करूँगा? कब मैं इन आँखों से श्यामाश्याम की उस अनुपम अथवा परम सुंदर छवि के दर्शन कर सकूँगा? [1]

कब युगल सरकार एक-दूसरे के गले में बाहें डाले हुए सुशोभित होंगे और मैं इस युगल-रस का आस्वादन करूँगा? हे करुणा-निधि श्री राधे! मेरी इस पुकार को सुनिए, मैं आपसे बार-बार यही विनती करता हूँ। [2]