रसविलसनी रसमगन नित - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (18)

रसविलसनी रसमगन नित - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (18)

रसविलसनी रसमगन नित, छिन छिन छटा अनूप ।
"रूपमाधुरी" के हिय, वसो अनौखो रूप ॥

- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, श्री राधा नाम अंक (18)

श्री रूपमाधुरी जी प्रार्थना करते हैं कि जो सदैव रस-विलास में निमग्न रहती हैं और जिनकी अनुपम छवि प्रत्येक क्षण नवीन एवं अद्भुत प्रतीत होती है, ऐसी श्री राधाजू का वह परम विलक्षण स्वरूप उनके हृदय में सदा के लिए निवास करे।