(सवैया)
मनमोहन तें बिछुरी जबसौं,
तन आँसुन सौं नित धोबती हैं । [1]
'हरिचन्द' जु प्रेम के फन्द परीं,
कुल की कुल लाजहिं खोवती हैं॥ [2]
दुःख के दिन कों कोऊ भाँति बितै,
बिरहागन रैन सँजोवती हैं। [3]
हमहीं अपनी दशा जानैं सखी,
निसि सोवती हैं किधौं रोवती हैं॥ [4]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (116)
एक विरहिणी गोपी अपनी पीड़ा व्यक्त करती है कि जब से प्राणप्रिय मनमोहन से बिछुड़ी हूँ, मेरा यह शरीर नित्य अश्रुओं की धारा से प्रक्षालित (धुलता) होता रहता है। [1]
श्री हरिचन्द कहते हैं—प्रेम के इस अटूट फन्दे में बंधकर मैं लोक-लाज और कुल की मर्यादा का त्याग कर बैठी हूँ। [2]
कष्टमय दिन तो किसी प्रकार व्यतीत हो जाते हैं, किंतु वियोग की ये लंबी रातें एक विरहिणी के लिए काटना अत्यंत दुष्कर हो जाता है। [3]
हे सखी! अपनी दशा तो मैं ही जानती हूँ—रात्रि में सोती हूँ या रोती हूँ, इसका मुझे भान तक नहीं रहता। [4]
मनमोहन तें बिछुरी जबसौं,
तन आँसुन सौं नित धोबती हैं । [1]
'हरिचन्द' जु प्रेम के फन्द परीं,
कुल की कुल लाजहिं खोवती हैं॥ [2]
दुःख के दिन कों कोऊ भाँति बितै,
बिरहागन रैन सँजोवती हैं। [3]
हमहीं अपनी दशा जानैं सखी,
निसि सोवती हैं किधौं रोवती हैं॥ [4]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, प्रेम माधुरी (116)
एक विरहिणी गोपी अपनी पीड़ा व्यक्त करती है कि जब से प्राणप्रिय मनमोहन से बिछुड़ी हूँ, मेरा यह शरीर नित्य अश्रुओं की धारा से प्रक्षालित (धुलता) होता रहता है। [1]
श्री हरिचन्द कहते हैं—प्रेम के इस अटूट फन्दे में बंधकर मैं लोक-लाज और कुल की मर्यादा का त्याग कर बैठी हूँ। [2]
कष्टमय दिन तो किसी प्रकार व्यतीत हो जाते हैं, किंतु वियोग की ये लंबी रातें एक विरहिणी के लिए काटना अत्यंत दुष्कर हो जाता है। [3]
हे सखी! अपनी दशा तो मैं ही जानती हूँ—रात्रि में सोती हूँ या रोती हूँ, इसका मुझे भान तक नहीं रहता। [4]

