यदैव सच्चिद्रसरूप बुद्धिवृन्दावनस्थस्थिरजंगमेषु ।
स्यान्निर्व्यलीकं पुरुषस्तदैव चकास्ति राधाप्रिय सेविरूपः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.84)
जब श्री वृन्दावन में स्थित स्थावर और जंगम सभी में सत्-चित्-रसस्वरूप बुद्धि निष्कपट रूप से उत्पन्न होती है, तब ही मनुष्य को श्री राधा की प्रिय सेवा-योग्य दासी-रूप की प्राप्ति होती है।
स्यान्निर्व्यलीकं पुरुषस्तदैव चकास्ति राधाप्रिय सेविरूपः॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.84)
जब श्री वृन्दावन में स्थित स्थावर और जंगम सभी में सत्-चित्-रसस्वरूप बुद्धि निष्कपट रूप से उत्पन्न होती है, तब ही मनुष्य को श्री राधा की प्रिय सेवा-योग्य दासी-रूप की प्राप्ति होती है।

