माधौ मोहिँ करौ वृंदावन रेनु - श्री सूरदास, सूरसागर (1107)

माधौ मोहिँ करौ वृंदावन रेनु - श्री सूरदास, सूरसागर (1107)

(राग सारंग)
माधौ मोहिँ करौ वृंदावन-रेनु।
जिहिँ चरननि डोलत नँद-नंदन, दिन-प्रति बन-बन चारत धेनु॥ [1]
कहा भयौ यह देव-देह धरि, अरु ऊँचें पद पाएँ ऐनु।
सब जीवनि लै उदर माँझ प्रभु, महा प्रलय-जल करत हौ सैनु॥ [2]
हम ते धन्य सदा वै तृन-द्रुम, बालक-बच्छ-बिषनाऽरू बेनु।
सूर श्याम जिनकें सँग डोलत, हँसि बोलत, मथि पीवतु फेनु॥ [3]

- श्री सूरदास, सूरसागर (1107)

ब्रह्मा जी विनयपूर्वक स्तुति करते हुए कहते हैं—“हे माधव! मुझे श्री वृन्दावन की पावन रज बना दीजिए। यह वही दिव्य रज है, जिस पर आप अपने चरणों से विचरण करते हैं और प्रतिदिन वन-वन जाकर गौओं को चराते हैं।” [1]

हे प्रभु! देवत्व का शरीर प्राप्त करना या ब्रह्म-पद को पाना भी आपके इस वृन्दावन-धाम के आनंद के सामने तुच्छ है। महाप्रलय के समय मेरी रची हुई समस्त सृष्टि नष्ट हो जाती है और उस समय आप ही समस्त जीवों को अपने उदर में धारण करते हुए जल में शयन करते हैं। परंतु यह वृन्दावन तो महाप्रलय से भी अप्रभावित रहता है। [2]

मुझ ब्रह्मा से भी अधिक धन्य तो ब्रज के तृण-द्रुम, बछड़े, बालक, गौएँ और वंशी आदि हैं, जिनके साथ, हे श्यामसुन्दर! आप वन-विहार करते हुए हँसते-खेलते और दही मथकर मक्खन का आस्वादन लेते हैं। [3]