हरि जन आवे बारने, हँसी हँसी नावे शीश।
उनके मन की वे जाने, मेरे मन जगदीश ॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (27)
जब श्रीहरि के भक्त आपके द्वार पर पधारें, तब पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ, नतमस्तक होकर उनका वंदन करना चाहिए। उनके हृदय का आंतरिक भाव क्या है, यह तो वे ही जानें; किंतु हमारा भाव तो यही होना चाहिए कि स्वयं अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक जगदीश्वर ही उनके रूप में साक्षात् पधारे हैं।
उनके मन की वे जाने, मेरे मन जगदीश ॥
- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (27)
जब श्रीहरि के भक्त आपके द्वार पर पधारें, तब पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ, नतमस्तक होकर उनका वंदन करना चाहिए। उनके हृदय का आंतरिक भाव क्या है, यह तो वे ही जानें; किंतु हमारा भाव तो यही होना चाहिए कि स्वयं अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक जगदीश्वर ही उनके रूप में साक्षात् पधारे हैं।

